What Is Nirankar ? - निरंकार क्या है ?
Know Nirankar here. - यहाँ निरंकार को जाने।
Nirankar : -
इस विशाल विश्व को बनाने वालीइस का पालन करने
वाली और इस में बदलाव करने वाली सत्ता को ईश्वर, खुदा,
अकालपुरखगॉड आदि कोई भी नाम हैं, परन्तु उसकी प्रभुता से
इन्कार नहीं किया जा सकता। वह परमसत्ता है, इसका प्रमाण
उसका अपना अस्तित्व ही है । यदि यह मान लें कि संसार तो
अपने पाँच मूल तत्वों से बना है तो भी इस रचना का इतना
नियमबद्ध होना और बिना किसी टकराव के आदिकाल से चले
आना भी किसी संचालक (परमसत्ता) के अस्तित्व को स्वीकार करने
के लिए विवश करता है। रचना का सौन्दर्य और सन्तुलन रचनहार
की कुशलता और निपुणता पर आधारित होता है इसलिए किसी
सर्वगुण सम्पन्न, सर्वशक्तिमानसर्वत्र परमसत्ता के अस्तित्व से इन्कार
नहीं किया जा सकता ।
प्राय: किसी भी व्यवस्था को सुचारु रूप से बनाए रखने के
लिए व्यवस्थापक का वहाँ होना भी जरूरी है। अतः विशाल प्रकृति
की व्यवस्था को सुचारु रूप प्रदान करने वाली सत्ता का सम्पूर्ण
रचना के साथ होना स्वाभाविक ही है । सर्वव्यापक सत्ता ही सृष्टि
के विधान को कायम रखने में सक्षम है। प्रश्न उठता है कि इतनी
विशाल सृष्टि के कणकण में रचे अनुशासन को बनाए रखने में
कोई स्थूल शक्ति कैसे सक्षम हो सकती है? कोई भी स्थूल आधार
सर्वव्यापी कैसे हो सकता है। अतः परम सत्ता आकार से अतीत
ही हो सकती है, वह निराकार ही है। सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म ऊर्जा ही
अपनी विशालता को बनाये रख सकती है और सर्वव्यावक हो
सकती है। अतः यह परम सत्ता जिसे कई नामों से पुकारा जाता
है, वास्तव में आकारों से अतीत है, निराकार है।
अब यह प्रश्न उठना मन में स्वाभाविक है कि आकारविहीन
तो कई तत्व हैं, फिर केवल परमसत्ता ईश्वर के लिए ही निराकार
शब्द कैसे प्रयोग हो सकता है? वायुआकाश आदि भी आकाररहित
हैं।
क्या इन्हें भगवान माना जा सकता है? इस प्रश्न का उत्तर
पाने के लिए हमें यह विचार करना होगा कि निराकार किसे कहा
जा सकता है? आकाररहित के लिए निराकार का शब्द प्रयोग तो
हो सकता है परन्तु आकार किसे माना जाए, इस पर पहले विचार
करना होगा
जड़चेतन सृष्टि को जिन मूल तत्वों के आधारित माना
जाता है, क्या वे निराकार भी माने जा सकते हैं? सूक्ष्म तत्वों को
आकाररहित होते हुए भी निराकार नहीं माना जा सकता, क्योंकि
जिसका भी आभास जड़ माध्यम के द्वारा होता है, वह आकाररहित
नहीं होता बल्कि सूक्ष्म आकार वाला कहा जा सकता है। जैसे वायु
या आकाश आदि का आभास हमें जड़ शरीर या किसी जड़
माध्यम से हो जाता है। इसका भाव यह कभी नहीं कहा जा सकता
कि वे आकाररहित हैं। क्योकि आकार के स्थूल या सूक्ष्म होने से
कोई अन्तर नहीं पड़ता। हाँ, यह कह सकते हैं कि इनके सूक्ष्म
आकार किसी दूसरे जड़ पदार्थ से प्रकट होते हैं, परन्तु आकार
के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में इन्हें
भी निराकार नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए हम टी.वी
देखते हैं। हजारों मील दूर कोई खेल हो रहा है और वह हमारे
घर के टी.वी. पर पूरा दिखाई देता है। इससे स्पष्ट है कि आज
विज्ञान ने प्रमाणित कर दिया है कि जड़ आकार को सूक्ष्म आकार
देकर मीलों दूर भेजा जा सकता है और उसे जड़ साधन से फिर
प्रकट किया जा सकता है, अर्थात् सूक्ष्म आकार का आभास कराया
जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार यह स्पष्ट हो जाता है कि
सूक्ष्म आकार भले ही सीधे दिखाई न , परन्तु निराकार नहीं माने
जा सकते। संक्षेप में यूं कहा जा सकता है कि जिसका किसी भी
जड़ माध्यम से आभास होता है, वह आकार ही है, निराकार नहीं
है। इसलिए इन सूक्ष्म आकारों को न निराकार माना जा सकता है।
और न ही इन्हें ईश्वर की संज्ञा दी जा सकती है।
यहाँ इस बात पर विचार करना होगा कि ऊर्जा सदैव
आकाररहित होती है। ऊर्जा के लिए गतिशील होना भी स्वाभाविक
है, वरना वह किसी प्रकार काम में नहीं लाई जा सकती। उसका
गतिशील होना ही स्थूल वस्तुओं की गति है, उनका प्राण है।
यह भी सर्वमान्य तथ्य है कि जितनी शक्तियों के विषय में हमारी
जानकारी है, उनका कोई न कोई तो स्रोत अवश्य है। जैसे बिजली
हाईड्रोलोजिकल या अन्य विधियों से कार्य करने वाले पावर हाउस
से प्राप्त होती है। वायु का आधार आकाश है। अग्नि पृथ्वी से
उत्पन्न होती है। यहाँ तक कि आज के युग की सबसे बड़ी परमाणु
शक्ति भी अणुओं के गठबंधन की देन है। धार्मिक मान्यता के
अनुसार ये सारी शक्तियाँ वास्तव में सूर्य के कारण हैं। यदि सूर्य
न हो तो विश्व में कहीं जीवन दिखाई न दे। अतः इस मतानुसार
सूर्य ही विभिन्न प्रकार की शक्तियों का वास्तविक स्रोत है और
सूर्य निराकार नहीं है। न ही यह ईश्वर है। यह भ्रष्टा की सृष्टि
का एक उपकरण है। अतः ऊर्जा को भी आकाररहित होते इए
निराकार ईश्वर नहीं माना जा सकताक्योंकि किसी पर निर्भर
रहने वाला काई भी त्व अमर नहीं रह सकता, उसमें उतार-चढ़ाव
अपने आधार के कारण होते रहेंगे। एक रस होना उसके लिए
असम्भव है और फिर यदि उसे स्वयं आधार की आवश्यकता है।
तो वह स्वतन्त्र रूप में किसी का सृजनपालन या बदलाव कैसे
कर सकता है। सृष्टिकर्ता के जिन मूल गुणों का हम वर्णन करते
हैं, उसमें अडोलएकरस और स्वयं में सर्वशक्तिमान होने की
विशेषता है। वह स्वयंभू है, स्वयंशक्ति है। सभी शक्तियों का संचालन
करने वाला है। अतः हमें मानना होगा कि उपरोक्त शक्तियाँ भले
ही आकाररहित दिखाई दें, परन्तु वे निराकार प्रभु नहीं मानी जा
इसी लड़ी में विशाल प्रकृति का भी विश्लेषण करें तो हम
पाएंगे कि पूरा ब्रह्माण्ड असीम शक्ति से भरा पड़ा है। यह शक्तिशाली
ब्रह्माण्ड अनादि काल से इसी प्रकार दिखाई दे रहा है और सभी
के निर्माणपालन और बदलाव का कारण प्रतीत होता है। क्या
इसे सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं कहा जा सकता? जड़-चेतन, सूक्ष्मस्थूल
संसार इसी में व्याप्त है। ब्रह्माण्ड की असीम शक्ति और सन्तुलित
व्यवस्था को देखकर ही कई लोग इसे ईश्वर के स्थान पर मान्यता
देते हैं। उनका कहना है कि नेचर (कुदरत) ही सब कुछ है, और
सबका आधार है।
इस विषय में गहराई से सोचने की जरूरत है। यह ब्रह्माण्ड
पाँच मूल तत्वों से बना है। उन तत्वों का भिन्न अनुपात ही इसमें
दिखाई देने वाली हर वस्तु के निर्माण का कारण है। वे तत्त्व
हैं-पृथ्वी, जलअग्नि, वायु और आकाश। यदि इन तत्वों का
विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि पृथ्वीजिसमें पाँचों तत्वों के
विषय उपस्थित हैं, भले ही कितनी बड़ी और शक्तिशाली दिखाई
दे, परन्तु यह सीमाबद्ध है। जल में चार तत्वों के विषय हैं, इस
सूक्ष्मता के परिणामस्वरूप इसका विस्तार और शक्ति पृथ्वी तत्वों
से तीन गुणा बढ़ जाती है। इसे भी हम तरल पदार्थ की संज्ञा देते
हैं और किसी अन्य साधन से नाप तोल सकते हैं। किसी विश्ष्टि
आकार से रहित होते हुए भी यह तरल रूप में व्यापक है। अपने
पात्र का आकार ग्रहण करता है। इसी प्रकार अग्नि की विशालता
और शक्ति का अनुमान लगाना भी कठिन है। उसमें केवल तीन
तत्त्वों के विषय होते हैं। वह भी आकाररहित नहीं, बल्कि किसी न
किसी जड़ वस्तु के माध्यम में व्यापक है, लेकिन है सीमाबद्ध । भले
ही इसकी विशालता और शक्ति महान दिखाई देती है। आखिर में
एक ही तत्त्व को अपनाने वाला आकाश है जो सूक्ष्म से सूक्ष्म है
जिसकी विशालता और असीम शक्ति ने ऐसा भ्रम पैदा किया है
कि हम इसे सर्वव्यापक समझकर पूरी प्रकृति का कर्ता कहने लगते
हैं और इसी के कारण हम प्रकृति को अनादि और स्वयं स्थित
मानने लगते हैं ।
उपरोक्त विवेचन पर यदि गहराई से विचार करें तो हम
पाएंगे कि सभी तत्त्व एक दूसरे पर निर्भर करते हैं। स्वतन्त्र रूप
में कोई भी कुछ करने में असमर्थ है। इनकी असामर्थ ही इनकी
प्रभुता पर प्रश्नचिन्ह लगा देती है। इन सबका किसी न किसी जड़
माध्यम द्वारा आभास हो जाता है इसलिए पहले दी गई आकार की
परिभाषा के अनुसार इनमें से कोई भी निराकार नहीं है। ब्रह्माण्ड
को ईश्वर की एक बड़ी रचना तो कह सकते हैं परन्तु इसे ईश्वर
नहीं माना जा सकता। परतन्त्र अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर
सकता। इन्हें भी अपने रचनहार के आधीन काम करना होता है ।
जो अनुशासित व्यवस्था इनके लिए निर्धारित कर रखी है, उसके
अन्तर्गत ही इन्हें सब कुछ करना पडता है।
रचना कभी रचनहार
नहीं होती। इसलिए ये न तो निराकार हैं और न परम सत्ता
ईश्वर ।
अतः सपष्ट है कि ब्रह्माण्ड में जो भी दृश्य हैं, जो भी
अदृश्य हैं, जो भी जड़ हैं या जो भी चेतन हैं, वे सभी अपने
आप में कुछ नहीं हैं। उनकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं। वे सभी
किसी न किसी के आधीन हैं, किसी अन्य पर आश्रित हैं। यह भी
स्पष्ट होता है कि इनकी रचना कुछ इस प्रकार बनी दिखाई देती
है कि ये सब कुछ माला के मनकों की तरह एक सूत्र में व्यवस्थित
ढंग से बँधे हुए हैं। इनका परस्पर तालमेल इतना गहरा है कि ये
एक दूसरे के बिना अपना अस्तित्व बनाए रखने में भी असमर्थ
हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि इतना विशाल ब्रह्माण्ड समय
के घेरे को भी तोड़ सकने की शक्ति नहीं रखता। काल ने इन
सबकी सीमा निर्धारित कर रखी है । ये सब उस समय के अन्तर्गत
ही लीला करते दिखाई देते हैं। काल के जाल में फंसा यह ब्रह्माण्ड
किसी प्रकार भी स्वतन्त्र प्रभु नहीं कहा जा सकताइनमें हो रहा
फेरबदल इसे आकाररहित भी प्रमाणित नहीं करता है, अत: न यह
ईश्वर है, न निराकार ।
अब तो यह स्पष्ट है कि प्रकृति की कोई भी चीज़
निराकार-ईश्वर नहीं। सभी कुछ पराधीन है। अब केवल एक मनुष्य
रह जाता है जिसमें निर्माण करने की भी शक्ति है, पालन करने
की भी और बदलाव करने की भी। यह अपने आपका विस्तार भी
कर सकता है और उसे समेट भी सकता है। यह कई रूप बनाकर
एक स्वप्न-संसार भी रच लेता है और फिर उसे साकार करने की
क्षमता भी रखता है। यह सर्वशक्तिमान भले ही न कहा जा सके,
परन्तु सर्वशक्तियों से सम्पन्न जरूर है। यह जड़ शरीरधारी भी है
और मानसिक रूप में आकाररहित भी। ऐसी स्थिति में इसे ईश्वर
मानने में क्या आपत्ति हो सकती है? किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से
पहले इस पर भी गहराई से विचार करना होगा।
मनुष्य के दो रूप प्रकट हैं-एक जड़ शरीरदूसरा सूक्ष्म
शरीर। उसका अहम् इन दोनों का मिश्रण है। उसके जड़ शरीर में
लगी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ एक मशीन की तरह काम करती हैं।
और उसकी सूक्ष्म चेतना मन में उठने वाले संकल्प और विकल्प
का फल है। जड़ शरीर अपने आप कुछ नहीं कर सकताकेवल
एक साधन मात्र है। यही कारण है कि एक मृत शरीर पूरे अंगों
सहित होते हुए भी कोई हरकत नहीं कर सकता। इसलिए जड़
शरीर को तो किसी प्रकार भी शक्तिमान नहीं माना जा सकता,
सूक्ष्म शरीर ही महत्व रखता है। वही इस मशीन को गतिशील
बनाता है बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि वास्तव में मनुष्य
यही सूक्ष्म शरीर है जो अपनी अपार मानसिक शक्ति द्वारा इस
जड़ शरीर के माध्यम से, असम्भव दिखाई देने वाले कार्य भी कर
सकने की क्षमता रखता है। यहाँ सोचने की बात यह है कि क्या
इस सूक्ष्म शरीर में अपने आप कार्य करने की शक्ति है या यह
भी किसी चेतनसत्ता के आधीन है? हम देखते हैं कि मन में उठने
वाले उद्गार कई बार साकार नहीं होते, हालाँकि उन्हें साकार
करने के लिए मन अपनी सभी इन्द्रियों के साधन से प्रयास करता
है। उसे कर्म करने में स्वतन्त्रता दिखाई देती है,परन्तु फल पाने में
नहीं। ऐसी स्थिति में फिर प्रश्न उठता है कि वह शक्ति कौन सी
है जो उसे फल प्रदान करती है, जिसका उसके कर्मों पर नियन्त्रण
है। यह भी कहा जाता है कि कर्म की प्रतिक्रिया ही उसका फल है।
परन्तु देखने में ऐसा नहीं लगता। शुभ माने जाने वाले कर्मों की
प्रतिक्रिया अशुभ फल देती है। अगर यह भी मान लें कि
अपने कर्म संचित कर लेता है, इसलिए उसे पता नहीं चलता कि
कब उसके अच्छे-बुरे कर्मों का फल मिल जाए। कई बार किये हुए
कर्म का तत्काल वैसा फल नहीं मिलता बल्कि संचित कर्मों का फल
भी भोगना पड़ता है जो कई बार देखने में उल्टा प्रतीत होता है।
यदि इस बात को भी मान लें तो भी प्रश्न होगा कि फिर कौनसी
सत्ता है जो उन कर्मों को संचित रखती है और उनका हिसाबकिताब
करने का समय निर्धारित करती है? अवश्यमेव वह शक्ति कोई
अन्य है और मनुष्य इसी शक्ति के आधीन है। इससे स्पष्ट है कि
मनुष्य - मनुष्य भी पराधीन है, स्वयंभू नहीं। इसलिए इसे भी ईश्वर की
संज्ञा नहीं दी जा सकती, इसे भी निरंकार प्रभु नहीं माना जा
सकता। इन सभी बातों पर विचार करने के बाद यह निर्णय लेना
कठिन नहीं कि फिर स्वयंभू कौन है, निराकार कौन है, ईश्वर
कौन है? यह तो स्पष्ट हो चुका है कि यह ब्रह्माण्ड और इसका
सब कुछ पराधीन है। यह सब एक परम शक्ति द्वारा क्रियाशील
होते हैं। परमसत्ता के विधानानुसार प्रकृति की वस्तुएँ बनती रहती
है और मिट जाती हैं। परम शक्ति की रचना किसी ने नहीं की ।
वह सारे ब्रह्माण्ड को सुचारू रूप से व्यवस्था में बनाए रखने में
सक्षम है। सभी शक्तियाँ परम सत्ता के आधीन हैं। या यूं कहना
चाहिए कि उसने अपनी ही शक्तियों को विस्तार देकर कई रूपों में
प्रकट किया हुआ है और यह जब चाहता है, इन्हें समेट लेता है।
यही सर्वव्यापक है स्वयंभू है, अनादि है। प्रकृति के होते हुए भी
है, प्रकृति के मिट जाने के बाद भी रहेगा। अपनी परमसत्ता को
कणकण में फैलाकर भी वह न जाने कितनी ऊर्जा अपने में लिए
हुएपूरी प्रकृति को अपने में स्थित किए हुए है। ऐसी परम सत्ता
को सर्वशक्तिमान कहने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती। किसी
जड़-सूक्ष्म माध्यम से उसे नहीं जाना जा सकता। अतः वास्तव में
यह परमसत्ता ही निराकार ईश्वर है। रचना को अपने रचनहार के
बारे में जानने की जिज्ञासा होती है, इसलिए इसकी अनुभूति करने
के लिए मनुष्य आदिकाल से प्रयत्नशील है । सफलता प्राप्त करने
वालों ने इसकी अनुभूति की है और इसे जानने की प्रेरणा भी दी
हमने ऊपर चर्चा की है कि जिसका भी आभास किसी जड़
माध्यम से होता है, उसे निराकार नहीं माना जा सकता। ऐसा भी
कहा गया है कि निराकार ईश्वर की अनुभूति भी मानव शरीर में
ही होती है। इस दृष्टि से क्या इस परमसत्ता को भी साकार ही
माना जाए? तत्वदर्शियों का मत है कि परमसत्ता को साकार शक्ति
नहीं माना जा सकता, क्योंकि साकार और निराकार स्वयंभू परमसत्ता
के बीच परस्पर एक मूल अन्तर है। साकार का अभिप्राय मात्र
अस्तित्व से ही नहीं बल्कि गुणों से भी है। साकार के रंगरूप
रस, गन्ध, स्पर्श आदि विषय होते हैं। इनका हमें किसी तरह ज्ञान
मिले तो हम इनको व्यक्त कर सकते हैं। परमसत्ता तो रंगरूप
रस, गन्ध, स्पर्श आदि सभी से परे है। हमें सृष्टि के माध्यम से
यह आभास तो मिलता है कि कोई परम निराकार स्वयंभू सत्ता है,
परन्तु सृष्टि के द्वारा हमें इस सता के रंग, रूपरस, गन्धस्पर्श
आदि का कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होता जिसके माध्यम से हम उस
निराकार स्वयं सत्ता को अपनी वाणी से या अन्य भौतिक साधनों
से व्यक्त कर सकें । हम आभास के द्वारा यह नहीं बता सकते कि
निराकार परम सत्ता का रंग, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श कैसा है। हाँ,
हम आत्मिक अनुभूति अवश्य कर सकते हैं उस अखण्ड आनन्द
के रूप में जिसे शास्त्रों में अव्यक्त कहा गया है। इसलिए निराकार
परमसत्ता की अनुभूति हमें होती है परन्तु वह सत्ता संज्ञा से परे
है। वह अखण्ड, अपरिमितअविभाज्य एवं अव्यक्त है। ऐसी निराकार
सत्ता को जानने में ही, मनुष्य जीवन की सार्थकता है और यह
जानकारी किसी जानकार विभूति के माध्यम से ही सम्भव है।
Dhan Nirankar Ji
Know Nirankar here. - यहाँ निरंकार को जाने।
Nirankar : -
इस विशाल विश्व को बनाने वालीइस का पालन करने
वाली और इस में बदलाव करने वाली सत्ता को ईश्वर, खुदा,
अकालपुरखगॉड आदि कोई भी नाम हैं, परन्तु उसकी प्रभुता से
इन्कार नहीं किया जा सकता। वह परमसत्ता है, इसका प्रमाण
उसका अपना अस्तित्व ही है । यदि यह मान लें कि संसार तो
अपने पाँच मूल तत्वों से बना है तो भी इस रचना का इतना
नियमबद्ध होना और बिना किसी टकराव के आदिकाल से चले
आना भी किसी संचालक (परमसत्ता) के अस्तित्व को स्वीकार करने
के लिए विवश करता है। रचना का सौन्दर्य और सन्तुलन रचनहार
की कुशलता और निपुणता पर आधारित होता है इसलिए किसी
सर्वगुण सम्पन्न, सर्वशक्तिमानसर्वत्र परमसत्ता के अस्तित्व से इन्कार
नहीं किया जा सकता ।
प्राय: किसी भी व्यवस्था को सुचारु रूप से बनाए रखने के
लिए व्यवस्थापक का वहाँ होना भी जरूरी है। अतः विशाल प्रकृति
की व्यवस्था को सुचारु रूप प्रदान करने वाली सत्ता का सम्पूर्ण
रचना के साथ होना स्वाभाविक ही है । सर्वव्यापक सत्ता ही सृष्टि
के विधान को कायम रखने में सक्षम है। प्रश्न उठता है कि इतनी
विशाल सृष्टि के कणकण में रचे अनुशासन को बनाए रखने में
कोई स्थूल शक्ति कैसे सक्षम हो सकती है? कोई भी स्थूल आधार
सर्वव्यापी कैसे हो सकता है। अतः परम सत्ता आकार से अतीत
ही हो सकती है, वह निराकार ही है। सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म ऊर्जा ही
अपनी विशालता को बनाये रख सकती है और सर्वव्यावक हो
सकती है। अतः यह परम सत्ता जिसे कई नामों से पुकारा जाता
है, वास्तव में आकारों से अतीत है, निराकार है।
अब यह प्रश्न उठना मन में स्वाभाविक है कि आकारविहीन
तो कई तत्व हैं, फिर केवल परमसत्ता ईश्वर के लिए ही निराकार
शब्द कैसे प्रयोग हो सकता है? वायुआकाश आदि भी आकाररहित
हैं।
क्या इन्हें भगवान माना जा सकता है? इस प्रश्न का उत्तर
पाने के लिए हमें यह विचार करना होगा कि निराकार किसे कहा
जा सकता है? आकाररहित के लिए निराकार का शब्द प्रयोग तो
हो सकता है परन्तु आकार किसे माना जाए, इस पर पहले विचार
करना होगा
जड़चेतन सृष्टि को जिन मूल तत्वों के आधारित माना
जाता है, क्या वे निराकार भी माने जा सकते हैं? सूक्ष्म तत्वों को
आकाररहित होते हुए भी निराकार नहीं माना जा सकता, क्योंकि
जिसका भी आभास जड़ माध्यम के द्वारा होता है, वह आकाररहित
नहीं होता बल्कि सूक्ष्म आकार वाला कहा जा सकता है। जैसे वायु
या आकाश आदि का आभास हमें जड़ शरीर या किसी जड़
माध्यम से हो जाता है। इसका भाव यह कभी नहीं कहा जा सकता
कि वे आकाररहित हैं। क्योकि आकार के स्थूल या सूक्ष्म होने से
कोई अन्तर नहीं पड़ता। हाँ, यह कह सकते हैं कि इनके सूक्ष्म
आकार किसी दूसरे जड़ पदार्थ से प्रकट होते हैं, परन्तु आकार
के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में इन्हें
भी निराकार नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए हम टी.वी
देखते हैं। हजारों मील दूर कोई खेल हो रहा है और वह हमारे
घर के टी.वी. पर पूरा दिखाई देता है। इससे स्पष्ट है कि आज
विज्ञान ने प्रमाणित कर दिया है कि जड़ आकार को सूक्ष्म आकार
देकर मीलों दूर भेजा जा सकता है और उसे जड़ साधन से फिर
प्रकट किया जा सकता है, अर्थात् सूक्ष्म आकार का आभास कराया
जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार यह स्पष्ट हो जाता है कि
सूक्ष्म आकार भले ही सीधे दिखाई न , परन्तु निराकार नहीं माने
जा सकते। संक्षेप में यूं कहा जा सकता है कि जिसका किसी भी
जड़ माध्यम से आभास होता है, वह आकार ही है, निराकार नहीं
है। इसलिए इन सूक्ष्म आकारों को न निराकार माना जा सकता है।
और न ही इन्हें ईश्वर की संज्ञा दी जा सकती है।
यहाँ इस बात पर विचार करना होगा कि ऊर्जा सदैव
आकाररहित होती है। ऊर्जा के लिए गतिशील होना भी स्वाभाविक
है, वरना वह किसी प्रकार काम में नहीं लाई जा सकती। उसका
गतिशील होना ही स्थूल वस्तुओं की गति है, उनका प्राण है।
यह भी सर्वमान्य तथ्य है कि जितनी शक्तियों के विषय में हमारी
जानकारी है, उनका कोई न कोई तो स्रोत अवश्य है। जैसे बिजली
हाईड्रोलोजिकल या अन्य विधियों से कार्य करने वाले पावर हाउस
से प्राप्त होती है। वायु का आधार आकाश है। अग्नि पृथ्वी से
उत्पन्न होती है। यहाँ तक कि आज के युग की सबसे बड़ी परमाणु
शक्ति भी अणुओं के गठबंधन की देन है। धार्मिक मान्यता के
अनुसार ये सारी शक्तियाँ वास्तव में सूर्य के कारण हैं। यदि सूर्य
न हो तो विश्व में कहीं जीवन दिखाई न दे। अतः इस मतानुसार
सूर्य ही विभिन्न प्रकार की शक्तियों का वास्तविक स्रोत है और
सूर्य निराकार नहीं है। न ही यह ईश्वर है। यह भ्रष्टा की सृष्टि
का एक उपकरण है। अतः ऊर्जा को भी आकाररहित होते इए
निराकार ईश्वर नहीं माना जा सकताक्योंकि किसी पर निर्भर
रहने वाला काई भी त्व अमर नहीं रह सकता, उसमें उतार-चढ़ाव
अपने आधार के कारण होते रहेंगे। एक रस होना उसके लिए
असम्भव है और फिर यदि उसे स्वयं आधार की आवश्यकता है।
तो वह स्वतन्त्र रूप में किसी का सृजनपालन या बदलाव कैसे
कर सकता है। सृष्टिकर्ता के जिन मूल गुणों का हम वर्णन करते
हैं, उसमें अडोलएकरस और स्वयं में सर्वशक्तिमान होने की
विशेषता है। वह स्वयंभू है, स्वयंशक्ति है। सभी शक्तियों का संचालन
करने वाला है। अतः हमें मानना होगा कि उपरोक्त शक्तियाँ भले
ही आकाररहित दिखाई दें, परन्तु वे निराकार प्रभु नहीं मानी जा
इसी लड़ी में विशाल प्रकृति का भी विश्लेषण करें तो हम
पाएंगे कि पूरा ब्रह्माण्ड असीम शक्ति से भरा पड़ा है। यह शक्तिशाली
ब्रह्माण्ड अनादि काल से इसी प्रकार दिखाई दे रहा है और सभी
के निर्माणपालन और बदलाव का कारण प्रतीत होता है। क्या
इसे सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं कहा जा सकता? जड़-चेतन, सूक्ष्मस्थूल
संसार इसी में व्याप्त है। ब्रह्माण्ड की असीम शक्ति और सन्तुलित
व्यवस्था को देखकर ही कई लोग इसे ईश्वर के स्थान पर मान्यता
देते हैं। उनका कहना है कि नेचर (कुदरत) ही सब कुछ है, और
सबका आधार है।
इस विषय में गहराई से सोचने की जरूरत है। यह ब्रह्माण्ड
पाँच मूल तत्वों से बना है। उन तत्वों का भिन्न अनुपात ही इसमें
दिखाई देने वाली हर वस्तु के निर्माण का कारण है। वे तत्त्व
हैं-पृथ्वी, जलअग्नि, वायु और आकाश। यदि इन तत्वों का
विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि पृथ्वीजिसमें पाँचों तत्वों के
विषय उपस्थित हैं, भले ही कितनी बड़ी और शक्तिशाली दिखाई
दे, परन्तु यह सीमाबद्ध है। जल में चार तत्वों के विषय हैं, इस
सूक्ष्मता के परिणामस्वरूप इसका विस्तार और शक्ति पृथ्वी तत्वों
से तीन गुणा बढ़ जाती है। इसे भी हम तरल पदार्थ की संज्ञा देते
हैं और किसी अन्य साधन से नाप तोल सकते हैं। किसी विश्ष्टि
आकार से रहित होते हुए भी यह तरल रूप में व्यापक है। अपने
पात्र का आकार ग्रहण करता है। इसी प्रकार अग्नि की विशालता
और शक्ति का अनुमान लगाना भी कठिन है। उसमें केवल तीन
तत्त्वों के विषय होते हैं। वह भी आकाररहित नहीं, बल्कि किसी न
किसी जड़ वस्तु के माध्यम में व्यापक है, लेकिन है सीमाबद्ध । भले
ही इसकी विशालता और शक्ति महान दिखाई देती है। आखिर में
एक ही तत्त्व को अपनाने वाला आकाश है जो सूक्ष्म से सूक्ष्म है
जिसकी विशालता और असीम शक्ति ने ऐसा भ्रम पैदा किया है
कि हम इसे सर्वव्यापक समझकर पूरी प्रकृति का कर्ता कहने लगते
हैं और इसी के कारण हम प्रकृति को अनादि और स्वयं स्थित
मानने लगते हैं ।
उपरोक्त विवेचन पर यदि गहराई से विचार करें तो हम
पाएंगे कि सभी तत्त्व एक दूसरे पर निर्भर करते हैं। स्वतन्त्र रूप
में कोई भी कुछ करने में असमर्थ है। इनकी असामर्थ ही इनकी
प्रभुता पर प्रश्नचिन्ह लगा देती है। इन सबका किसी न किसी जड़
माध्यम द्वारा आभास हो जाता है इसलिए पहले दी गई आकार की
परिभाषा के अनुसार इनमें से कोई भी निराकार नहीं है। ब्रह्माण्ड
को ईश्वर की एक बड़ी रचना तो कह सकते हैं परन्तु इसे ईश्वर
नहीं माना जा सकता। परतन्त्र अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर
सकता। इन्हें भी अपने रचनहार के आधीन काम करना होता है ।
जो अनुशासित व्यवस्था इनके लिए निर्धारित कर रखी है, उसके
अन्तर्गत ही इन्हें सब कुछ करना पडता है।
रचना कभी रचनहार
नहीं होती। इसलिए ये न तो निराकार हैं और न परम सत्ता
ईश्वर ।
अतः सपष्ट है कि ब्रह्माण्ड में जो भी दृश्य हैं, जो भी
अदृश्य हैं, जो भी जड़ हैं या जो भी चेतन हैं, वे सभी अपने
आप में कुछ नहीं हैं। उनकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं। वे सभी
किसी न किसी के आधीन हैं, किसी अन्य पर आश्रित हैं। यह भी
स्पष्ट होता है कि इनकी रचना कुछ इस प्रकार बनी दिखाई देती
है कि ये सब कुछ माला के मनकों की तरह एक सूत्र में व्यवस्थित
ढंग से बँधे हुए हैं। इनका परस्पर तालमेल इतना गहरा है कि ये
एक दूसरे के बिना अपना अस्तित्व बनाए रखने में भी असमर्थ
हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि इतना विशाल ब्रह्माण्ड समय
के घेरे को भी तोड़ सकने की शक्ति नहीं रखता। काल ने इन
सबकी सीमा निर्धारित कर रखी है । ये सब उस समय के अन्तर्गत
ही लीला करते दिखाई देते हैं। काल के जाल में फंसा यह ब्रह्माण्ड
किसी प्रकार भी स्वतन्त्र प्रभु नहीं कहा जा सकताइनमें हो रहा
फेरबदल इसे आकाररहित भी प्रमाणित नहीं करता है, अत: न यह
ईश्वर है, न निराकार ।
अब तो यह स्पष्ट है कि प्रकृति की कोई भी चीज़
निराकार-ईश्वर नहीं। सभी कुछ पराधीन है। अब केवल एक मनुष्य
रह जाता है जिसमें निर्माण करने की भी शक्ति है, पालन करने
की भी और बदलाव करने की भी। यह अपने आपका विस्तार भी
कर सकता है और उसे समेट भी सकता है। यह कई रूप बनाकर
एक स्वप्न-संसार भी रच लेता है और फिर उसे साकार करने की
क्षमता भी रखता है। यह सर्वशक्तिमान भले ही न कहा जा सके,
परन्तु सर्वशक्तियों से सम्पन्न जरूर है। यह जड़ शरीरधारी भी है
और मानसिक रूप में आकाररहित भी। ऐसी स्थिति में इसे ईश्वर
मानने में क्या आपत्ति हो सकती है? किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से
पहले इस पर भी गहराई से विचार करना होगा।
मनुष्य के दो रूप प्रकट हैं-एक जड़ शरीरदूसरा सूक्ष्म
शरीर। उसका अहम् इन दोनों का मिश्रण है। उसके जड़ शरीर में
लगी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ एक मशीन की तरह काम करती हैं।
और उसकी सूक्ष्म चेतना मन में उठने वाले संकल्प और विकल्प
का फल है। जड़ शरीर अपने आप कुछ नहीं कर सकताकेवल
एक साधन मात्र है। यही कारण है कि एक मृत शरीर पूरे अंगों
सहित होते हुए भी कोई हरकत नहीं कर सकता। इसलिए जड़
शरीर को तो किसी प्रकार भी शक्तिमान नहीं माना जा सकता,
सूक्ष्म शरीर ही महत्व रखता है। वही इस मशीन को गतिशील
बनाता है बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि वास्तव में मनुष्य
यही सूक्ष्म शरीर है जो अपनी अपार मानसिक शक्ति द्वारा इस
जड़ शरीर के माध्यम से, असम्भव दिखाई देने वाले कार्य भी कर
सकने की क्षमता रखता है। यहाँ सोचने की बात यह है कि क्या
इस सूक्ष्म शरीर में अपने आप कार्य करने की शक्ति है या यह
भी किसी चेतनसत्ता के आधीन है? हम देखते हैं कि मन में उठने
वाले उद्गार कई बार साकार नहीं होते, हालाँकि उन्हें साकार
करने के लिए मन अपनी सभी इन्द्रियों के साधन से प्रयास करता
है। उसे कर्म करने में स्वतन्त्रता दिखाई देती है,परन्तु फल पाने में
नहीं। ऐसी स्थिति में फिर प्रश्न उठता है कि वह शक्ति कौन सी
है जो उसे फल प्रदान करती है, जिसका उसके कर्मों पर नियन्त्रण
है। यह भी कहा जाता है कि कर्म की प्रतिक्रिया ही उसका फल है।
परन्तु देखने में ऐसा नहीं लगता। शुभ माने जाने वाले कर्मों की
प्रतिक्रिया अशुभ फल देती है। अगर यह भी मान लें कि
अपने कर्म संचित कर लेता है, इसलिए उसे पता नहीं चलता कि
कब उसके अच्छे-बुरे कर्मों का फल मिल जाए। कई बार किये हुए
कर्म का तत्काल वैसा फल नहीं मिलता बल्कि संचित कर्मों का फल
भी भोगना पड़ता है जो कई बार देखने में उल्टा प्रतीत होता है।
यदि इस बात को भी मान लें तो भी प्रश्न होगा कि फिर कौनसी
सत्ता है जो उन कर्मों को संचित रखती है और उनका हिसाबकिताब
करने का समय निर्धारित करती है? अवश्यमेव वह शक्ति कोई
अन्य है और मनुष्य इसी शक्ति के आधीन है। इससे स्पष्ट है कि
मनुष्य - मनुष्य भी पराधीन है, स्वयंभू नहीं। इसलिए इसे भी ईश्वर की
संज्ञा नहीं दी जा सकती, इसे भी निरंकार प्रभु नहीं माना जा
सकता। इन सभी बातों पर विचार करने के बाद यह निर्णय लेना
कठिन नहीं कि फिर स्वयंभू कौन है, निराकार कौन है, ईश्वर
कौन है? यह तो स्पष्ट हो चुका है कि यह ब्रह्माण्ड और इसका
सब कुछ पराधीन है। यह सब एक परम शक्ति द्वारा क्रियाशील
होते हैं। परमसत्ता के विधानानुसार प्रकृति की वस्तुएँ बनती रहती
है और मिट जाती हैं। परम शक्ति की रचना किसी ने नहीं की ।
वह सारे ब्रह्माण्ड को सुचारू रूप से व्यवस्था में बनाए रखने में
सक्षम है। सभी शक्तियाँ परम सत्ता के आधीन हैं। या यूं कहना
चाहिए कि उसने अपनी ही शक्तियों को विस्तार देकर कई रूपों में
प्रकट किया हुआ है और यह जब चाहता है, इन्हें समेट लेता है।
यही सर्वव्यापक है स्वयंभू है, अनादि है। प्रकृति के होते हुए भी
है, प्रकृति के मिट जाने के बाद भी रहेगा। अपनी परमसत्ता को
कणकण में फैलाकर भी वह न जाने कितनी ऊर्जा अपने में लिए
हुएपूरी प्रकृति को अपने में स्थित किए हुए है। ऐसी परम सत्ता
को सर्वशक्तिमान कहने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती। किसी
जड़-सूक्ष्म माध्यम से उसे नहीं जाना जा सकता। अतः वास्तव में
यह परमसत्ता ही निराकार ईश्वर है। रचना को अपने रचनहार के
बारे में जानने की जिज्ञासा होती है, इसलिए इसकी अनुभूति करने
के लिए मनुष्य आदिकाल से प्रयत्नशील है । सफलता प्राप्त करने
वालों ने इसकी अनुभूति की है और इसे जानने की प्रेरणा भी दी
हमने ऊपर चर्चा की है कि जिसका भी आभास किसी जड़
माध्यम से होता है, उसे निराकार नहीं माना जा सकता। ऐसा भी
कहा गया है कि निराकार ईश्वर की अनुभूति भी मानव शरीर में
ही होती है। इस दृष्टि से क्या इस परमसत्ता को भी साकार ही
माना जाए? तत्वदर्शियों का मत है कि परमसत्ता को साकार शक्ति
नहीं माना जा सकता, क्योंकि साकार और निराकार स्वयंभू परमसत्ता
के बीच परस्पर एक मूल अन्तर है। साकार का अभिप्राय मात्र
अस्तित्व से ही नहीं बल्कि गुणों से भी है। साकार के रंगरूप
रस, गन्ध, स्पर्श आदि विषय होते हैं। इनका हमें किसी तरह ज्ञान
मिले तो हम इनको व्यक्त कर सकते हैं। परमसत्ता तो रंगरूप
रस, गन्ध, स्पर्श आदि सभी से परे है। हमें सृष्टि के माध्यम से
यह आभास तो मिलता है कि कोई परम निराकार स्वयंभू सत्ता है,
परन्तु सृष्टि के द्वारा हमें इस सता के रंग, रूपरस, गन्धस्पर्श
आदि का कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होता जिसके माध्यम से हम उस
निराकार स्वयं सत्ता को अपनी वाणी से या अन्य भौतिक साधनों
से व्यक्त कर सकें । हम आभास के द्वारा यह नहीं बता सकते कि
निराकार परम सत्ता का रंग, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श कैसा है। हाँ,
हम आत्मिक अनुभूति अवश्य कर सकते हैं उस अखण्ड आनन्द
के रूप में जिसे शास्त्रों में अव्यक्त कहा गया है। इसलिए निराकार
परमसत्ता की अनुभूति हमें होती है परन्तु वह सत्ता संज्ञा से परे
है। वह अखण्ड, अपरिमितअविभाज्य एवं अव्यक्त है। ऐसी निराकार
सत्ता को जानने में ही, मनुष्य जीवन की सार्थकता है और यह
जानकारी किसी जानकार विभूति के माध्यम से ही सम्भव है।
Dhan Nirankar Ji


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